हरियाणा मंडियों में धान खरीद पर संकट, मिलर्स का रजिस्ट्रेशन ठप

Haryana grain market paddy procurement crisis as rice millers boycott registration over pending dues and bonus issues in mandis
हरियाणा की अनाज मंडियों में इन दिनों धान की आवक तो तेजी से बढ़ रही है, लेकिन खरीद प्रक्रिया पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। राज्य में धान की फसल मंडियों तक पहुंच चुकी है, परंतु मिलर्स के रजिस्ट्रेशन, एग्रीमेंट के पेंच और उनकी लंबित भुगतानों की मांगों के कारण व्यवस्था चरमरा गई है। इस समस्या के चलते किसानों और मिलर्स दोनों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
धान की बंपर आवक और खरीद प्रक्रिया में रुकावट
प्रदेश की प्रमुख अनाज मंडियों में किसानों द्वारा धान लाया जा रहा है। स्थिति यह है कि यमुनानगर, कैथल, जींद, करनाल, फतेहाबाद और सिरसा जैसे बड़े कृषि जिलों में भारी मात्रा में धान पहुंच चुका है। अकेले यमुनानगर में अब तक अच्छी-खासी मात्रा में धान आ चुका है, जबकि कैथल और फतेहाबाद में भी हजारों क्विंटल फसल मंडियों में डंप हो चुकी है।
तमाम मंडियों में एक बड़ी बाधा फसल में तय मानकों से अधिक नमी का पाया जाना भी है। सरकारी नियमों के अनुसार धान की खरीद के लिए नमी का स्तर 17 प्रतिशत होना अनिवार्य है, जबकि मंडियों में पहुंच रही फसल में नमी 22 से 24 प्रतिशत तक दर्ज की जा रही है। नमी अधिक होने और मिलर्स की तरफ से पंजीकरण न कराए जाने के कारण अधिकांश मंडियों में खरीद का काम ठप पड़ा है या बेहद धीमी गति से चल रहा है।
मिलर्स और एजेंसियों के बीच भुगतान का बड़ा विवाद
इस पूरे गतिरोध के केंद्र में राइस मिलर्स का बकाया भुगतान और पंजीकरण का मुद्दा है। प्रदेशभर में लगभग 1400 राइस मिलर्स खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, स्टेट वेयरहाउस और हैफेड के साथ मिलकर कस्टम मिल्ड राइस (सीएमआर) का कार्य करते हैं। हालांकि, खाद्य विभाग भले ही किसी बकाया से इनकार कर रहा हो, लेकिन स्टेट वेयरहाउस और हैफेड पर मिलर्स का 500 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान पिछले दो साल से अटका हुआ है।
इस लंबित राशि में सीएमआर मिलिंग के साथ-साथ लोडिंग, अनलोडिंग और स्टेकिंग से जुड़े कार्य भी शामिल हैं। इसके अलावा पिछले दो वर्षों से मिलने वाला बोनस भी मिलर्स को नहीं मिला है। वित्तीय मोर्चे पर हो रही इस देरी से नाराज होकर मिलर्स ने फिलहाल 'नो रजिस्ट्रेशन और नो एग्रीमेंट' का कड़ा रुख अपना लिया है। यही वजह है कि राज्य के करीब 1400 मिलर्स में से अब तक मात्र 590 ने ही पंजीकरण के लिए आवेदन किया है और इनमें से भी केवल 215 मिलर्स के ही रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हो पाई है।
अलग-अलग जिलों में कैसे हैं हालात
- करनाल और यमुनानगर: करनाल में करीब 200 में से केवल 70 मिलर्स पंजीकृत हैं, जहाँ मिलर्स के पास भारी मात्रा में चावल स्टॉक में है और 15 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है। वहीं यमुनानगर में भी 185 मिलर्स का लगभग 100 करोड़ रुपये बकाया फंसा हुआ है।
- फतेहाबाद और सिरसा: फतेहाबाद मंडियों में धान पहुंच तो रहा है, परंतु नमी की अधिकता (लगभग 24 प्रतिशत) के कारण खरीद नहीं हो पा रही है। जिला प्रशासन स्थिति का जायजा लेने के लिए लगातार मंडियों का निरीक्षण कर रहा है। सिरसा में भी 72 में से केवल 24 मिलर्स की सीएमआर प्रक्रिया शुरू हो पाई है, जहाँ अधिक नमी के चलते खरीद रुकी हुई है
- कैथल और जींद: कैथल में हजारों क्विंटल आवक के मुकाबले खरीद का आंकड़ा बेहद कम है क्योंकि यहाँ भी नमी तय सीमा से काफी अधिक पाई जा रही है। जींद के उचाना और अन्य क्षेत्रों में भी मिलर्स के रजिस्ट्रेशन के अभाव में खरीद कार्य प्रभावित हो रहा है।
मिलर्स एसोसिएशन की प्रमुख मांगें
राइस मिलर्स एवं डीलर्स एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष अमरजीत छाबड़ा ने सरकार और संबंधित विभागों के सामने कई गंभीर मांगें रखी हैं। उनका कहना है कि जब तक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक व्यवस्था सुचारू नहीं हो सकती।
- वित्तीय वर्ष 2024-25 का बकाया बोनस जल्द से जल्द जारी किया जाए।
- नए सीजन के लिए धान पर 100 रुपये प्रति क्विंटल का नया बोनस तय किया जाए।
- भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में धान और चावल के भंडारण के लिए पर्याप्त और बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
- आईपीआर चावल में आ रही 'ब्रोकेन' (टूटने) की समस्या का उचित समाधान निकाला जाए।
- मंडियों में फसल की नमी, डैमेज, डिसकलर और ब्रोकन की जांच पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से और तय मानकों के आधार पर की जाए।
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समाधान की ओर प्रशासनिक प्रयास
मंडियों में किसानों की परेशानी को देखते हुए प्रशासन अब हरकत में आ गया है। विभिन्न जिलों के उपायुक्त और संबंधित अधिकारी स्वयं मंडियों का दौरा कर रहे हैं ताकि खरीद केंद्रों पर आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को दूर किया जा सके। हालांकि, जब तक सरकार और मिलर्स के बीच वित्तीय भुगतान और पंजीकरण के इस गतिरोध का कोई ठोस हल नहीं निकलता, तब तक किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। धान के इस सीजन को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर बड़े निर्णयों की आवश्यकता है।
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